अब ‘किराए पर मिलते हैं चार कंधे’, टूटते रिश्तों के बीच अंतिम संस्कार के लिए घाट तक कंधा देना बन रहा नया स्टार्ट-अप
वाराणसी : मोक्ष की नगरी काशी में मानवीय संवेदनाओं और बदलते सामाजिक ताने-बाने को झकझोर देने वाली एक ऐसी हकीकत सामने आई है, जो आज के दौर के खोखले होते रिश्तों का आईना दिखाती है। कभी सरकारी महकमे में अपनी हनक और रसूख के लिए जाने जाने वाले एक रिटायर्ड अफसर (सिन्हा साहब) की जीवन संगिनी का जब निधन हुआ, तो उनके शव को महाश्मशान घाट तक ले जाने के लिए चार अपने कंधे तक मयस्सर नहीं हुए। रिश्तेदारों की बेरुखी और अपनों के मुंह मोड़ लेने के बाद अंततः काशी में ‘मेहनताना लेकर कंधा देने वाले’ चार अनजान युवकों ने उस लाचार पति की धर्मपत्नी की अंतिम यात्रा पूरी कराई।
पद का गुमान और रिश्तेदारों की बेरुखी ने दिखाया अकेलापन
अपनी पूरी नौकरी के दौरान ऊंचे ओहदे पर रहे सिन्हा साहब एकांतप्रिय व्यक्ति थे। अपनी व्यस्तता और पद की हनक के चलते उन्होंने कभी सामाजिक मेल-जोल या दूसरों के सुख-दुख में शरीक होना जरूरी नहीं समझा। लेकिन नियति का क्रूर प्रहार तब हुआ जब पत्नी के देहांत के आठ घंटे बीत जाने के बाद भी उनके घर कोई नहीं पहुंचा। जब उन्होंने एक-एक कर सभी सगे-संबंधियों को फोन मिलाया, तो हर तरफ से केवल औपचारिक अफसोस और ‘दूरी बहुत है, आ नहीं पाएंगे’ जैसी मजबूरियों भरे टके से जवाब मिले। गाड़ी में पत्नी का शव पीछे पड़ा था और पूर्व अफसर मैदागिन चौराहे पर सड़क किनारे खड़े होकर चार कंधों के लिए धर्मसंकट में आंसू बहा रहे थे।
जब वीआईपी हूटर के बीच निकली ‘किराए के कंधों’ की अर्थी
सड़क पर लाचार खड़े बुजुर्ग के पास तभी चार स्थानीय नौजवान पहुंचे। कुछ बातचीत और तय मेहनताने के बाद सौदा तय हुआ और इन चार अनजान युवाओं ने मृतका की अर्थी को अपने कांधों पर उठा लिया। पत्नी के जाने का गहरा गम लिए सिन्हा साहब के चेहरे पर इस बात का थोड़ा सुकून दिखा कि अब उनकी अर्धांगिनी की अंतिम यात्रा कम से कम लावारिस नहीं रहेगी। अभी ‘राम नाम सत्य है’ के उद्घोष के साथ यह यात्रा मणिकर्णिका की ओर बढ़ ही रही थी कि पीछे से हूटर बजाता हुआ एक वीआईपी काफिला गुजरा। जिस रास्ते पर शव वाहन तक को रोक दिया गया था, वहां से वीआईपी गाड़ियां फर्राटा भरते हुए निकल गईं। उस पल सिन्हा साहब को अहसास हुआ कि पद जाते ही दुनिया किस कदर इंसान को भुला देती है।
काशी में उभरती नई व्यवस्था: मजबूरी या संवेदना का पेशा?
काशी के महाश्मशान की राह पर अब यह एक नई व्यवस्था के रूप में स्थापित हो रहा है। बड़े शहरों और अकेलेपन की मार झेल रहे बुजुर्गों के लिए ये युवक किसी फरिश्ते से कम नहीं हैं, जिनके अपने या तो विदेश में हैं या फिर मतलब खत्म होते ही किनारा कर चुके हैं। ये युवक अंतिम संस्कार का पूरा जिम्मा उठाते हैं और सम्मानपूर्वक देह को मुखाग्नि स्थल तक पहुंचाते हैं। इसे चाहे बाजारवाद का असर कहें या टूटते रिश्तों की कड़वी सच्चाई, मगर सच यह है कि इस व्यवस्था के चलते किसी बेबस की अंतिम यात्रा अधूरी नहीं रहती।
कंधा देने वाले युवकों का दर्द: ‘यह सिर्फ पैसा नहीं, इंसानियत का साथ है’
इस पेशे से जुड़े युवकों का कहना है कि उन्होंने भले ही शुरुआत रोजी-रोटी के लिए की थी, लेकिन अब यह सेवा का भाव बन चुका है। युवा सुभाष सोनी बताते हैं कि जब कोई परिवार अंतिम वक्त पर बिल्कुल लाचार खड़ा होता है, तो उन्हें पैसे से ज्यादा एक सहारे की जरूरत होती है। वहीं दीनदयाल गोंड और रमेश का कहना है कि शुरुआत में परिजनों को यह काम अजीब लगा, लेकिन अब सुकून मिलता है कि वे किसी की अंतिम विदाई का सहारा बन रहे हैं। मनीष पाल कहते हैं कि आज की डिजिटल दुनिया में लोग मोबाइल में उलझकर अपनों से इतने कट चुके हैं कि अंतिम समय में कंधा देने तक के लिए लोग नहीं जुटते, ऐसे में हमारी यह सेवा समाज की एक बड़ी कड़वी जरूरत बन चुकी है।









