हिमालय में बर्फबारी का पैटर्न बदलने से बढ़ रहा खतरा,बदरीनाथ धाम के पास टूटा ग्लेशियर..
नई दिल्ली- उत्तराखंड के प्रसिद्ध बदरीनाथ धाम के पास कंचनगंगा क्षेत्र में ग्लेशियर टूटने की घटना ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते जलवायु संकट की चिंता बढ़ा दी है। बदरीनाथ धाम से करीब चार किलोमीटर दूर हुए इस घटनाक्रम में फिलहाल किसी तरह के जान-माल के नुकसान की सूचना नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक इसे आने वाले बड़े खतरे का संकेत मान रहे हैं। प्रशासन ने स्थिति पर लगातार नजर बनाए रखी है। चमोली के पुलिस अधीक्षक सुरजीत सिंह पंवार के अनुसार, क्षेत्र की निगरानी की जा रही है और किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए टीमें अलर्ट पर हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालय में मौसम का पैटर्न तेजी से बदल रहा है। पहले जहां जनवरी और फरवरी को भारी बर्फबारी का मौसम माना जाता था, वहीं अब मार्च और अप्रैल में ज्यादा बर्फ गिर रही है। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह बदलाव ग्लेशियरों के लिए खतरनाक साबित हो रहा है, क्योंकि गर्म महीनों में पड़ने वाली बर्फ तेजी से पिघल जाती है। इससे ग्लेशियर कमजोर हो रहे हैं और उनका आकार लगातार घट रहा है।
वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों के शोध में सामने आया है कि पश्चिमी विक्षोभ के बदलते स्वरूप ने हिमालयी क्षेत्रों में मौसम का संतुलन बिगाड़ दिया है। सर्दियों में कमजोर पश्चिमी विक्षोभ के कारण बर्फबारी कम हो रही है, जबकि गर्मियों में इसकी सक्रियता बढ़ने से बारिश, ओलावृष्टि और प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ गया है। वैज्ञानिक डॉ. पंकज चौहान के अनुसार, पिंडारी और कफनी जैसे ग्लेशियर तेजी से प्रभावित हो रहे हैं और यही स्थिति पूरे मध्य हिमालय में देखी जा रही है।
पर्यावरणविद् पद्मविभूषण डॉ. अनिल जोशी ने चेतावनी दी है कि मौसम में यह बदलाव केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर अर्थव्यवस्था और समाज पर भी पड़ेगा। खाद्य उत्पादन प्रभावित होने से अनाज की कीमतें बढ़ सकती हैं, जबकि पर्यटन और बागवानी जैसे क्षेत्रों को भी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
इस वर्ष पिंडारी और कफनी ग्लेशियर क्षेत्र में अप्रैल महीने में सबसे अधिक 158 सेंटीमीटर बर्फबारी दर्ज की गई, जबकि मार्च में 84 सेंटीमीटर बर्फ गिरी। वैज्ञानिकों का कहना है कि अधिक तापमान के कारण यह बर्फ तेजी से पिघल रही है। कई इलाकों में तापमान सामान्य से 5 डिग्री सेल्सियस तक अधिक दर्ज किया गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाले वर्षों में हिमालयी जलधाराओं, जल संसाधनों और पर्यावरणीय संतुलन पर गंभीर असर पड़ सकता है।









